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एनसीईआरटी विवाद पर कोर्ट सख्त
एनसीईआरटी किताब विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सोशल मीडिया ट्रोलर्स को चेतावनी, न्यायपालिका अध्याय की समीक्षा के आदेश
11 Mar 2026, 01:30 PM Delhi - New Delhi
Reporter : Mahesh Sharma
New Delhi

पाठ्यपुस्तक सामग्री पर उठे गंभीर सवाल

देश की स्कूली शिक्षा से जुड़ी किताबों में किए गए बदलाव को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए न्यायपालिका से जुड़े अध्याय की सामग्री पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत का कहना है कि विद्यार्थियों को पढ़ाई जाने वाली सामग्री पूरी तरह संतुलित, तथ्यात्मक और जिम्मेदार होनी चाहिए। यदि किसी विषय को हटाया या बदला जाता है तो उसका स्पष्ट कारण और शैक्षणिक आधार होना जरूरी है। अदालत ने संकेत दिया कि शिक्षा व्यवस्था में इस तरह के बदलाव बेहद सावधानी के साथ किए जाने चाहिए, क्योंकि इनका सीधा असर छात्रों की समझ और भविष्य की सोच पर पड़ता है।

विशेषज्ञ समिति से होगी समीक्षा

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस विषय की गहराई से जांच के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की आवश्यकता जताई। अदालत का मानना है कि शिक्षा और न्यायपालिका जैसे संवेदनशील विषयों पर सामग्री तैयार करते समय विशेषज्ञों की राय बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसी वजह से संबंधित संस्थानों और शैक्षणिक विशेषज्ञों को इस प्रक्रिया में शामिल करने का सुझाव दिया गया है। समिति का काम यह देखना होगा कि पाठ्यपुस्तकों में मौजूद जानकारी छात्रों के लिए उचित और संतुलित है या नहीं। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी संस्था की भूमिका या महत्व को गलत तरीके से प्रस्तुत न किया जाए।

न्यायपालिका अध्याय पर जताई नाराजगी

सुनवाई के दौरान अदालत ने विशेष रूप से उस अध्याय को लेकर नाराजगी जताई जिसमें न्यायपालिका से संबंधित जानकारी दी गई है। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था देश के लोकतांत्रिक ढांचे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, इसलिए इसकी भूमिका और कार्यप्रणाली को छात्रों के सामने स्पष्ट और सम्मानजनक तरीके से रखा जाना चाहिए। अदालत के अनुसार यदि किसी अध्याय में आवश्यक जानकारी को हटाया जाता है या उसे सीमित किया जाता है तो इससे छात्रों की समझ पर असर पड़ सकता है। इसलिए इस विषय की समीक्षा बेहद जरूरी है।

सोशल मीडिया पर सख्त संदेश

सुनवाई के दौरान अदालत ने सोशल मीडिया पर फैल रही टिप्पणियों और ट्रोलिंग पर भी कड़ा संदेश दिया। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक मंचों पर संस्थाओं और व्यक्तियों के बारे में टिप्पणी करते समय जिम्मेदारी और मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। अदालत का कहना था कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है और कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अनुचित तरीके से टिप्पणी करता है या गलत जानकारी फैलाता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का मुद्दा

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक अध्याय या किताब तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता से भी जुड़ा हुआ है। जब छात्रों को किसी विषय के बारे में जानकारी दी जाती है तो उसका आधार तथ्य और संतुलन होना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बनाना है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों की सामग्री तैयार करते समय शैक्षणिक गुणवत्ता और निष्पक्षता का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

भविष्य में बदलाव की संभावना

इस मामले में अदालत के निर्देशों के बाद अब आगे की प्रक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट आने के बाद यह तय किया जाएगा कि किताबों में किस प्रकार के बदलाव किए जाएं। संभावना है कि भविष्य में पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा की प्रक्रिया को और अधिक मजबूत बनाया जाए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि छात्रों को दी जाने वाली जानकारी पूरी तरह विश्वसनीय और संतुलित हो। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और मजबूत बनाने में मदद कर सकता है।

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